अंतिम अपडेट: 6 जुलाई, 2026
मान लीजिए किसी ने आपसे कहा, “यार, उसके खिलाफ 498A लग गया है” — और आप सोच रहे हैं, “रुको, अब तो नया कानून आ गया है ना, फिर 498A कैसे?” बस यही कन्फ्यूजन आज हम दूर करेंगे।
BNS 85 — यानी भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 — भारत के नए आपराधिक कानून व्यवस्था का एक ऐसा प्रावधान है जो पुराने IPC सेक्शन 498A की जगह ले चुका है। अगर आप BNS 85 in Hindi सर्च कर रहे हैं, तो समझ लीजिए कि आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं। हम इस लेख में सब कुछ कवर करेंगे — BNS 85 क्या है, उसका दंड, BNS 85 बेलेबल है या नहीं, और IPC से तुलना भी।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख केवल सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। यह किसी भी तरह की कानूनी सलाह नहीं है। किसी भी कानूनी मामले में आगे बढ़ने से पहले, कृपया एक योग्य वकील से सलाह ज़रूर लें।
चलिए, बिना समय गंवाए सीधे मुद्दे पर आते हैं।
एक नज़र में — BNS 85 के मुख्य आंकड़े
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| धारा का नाम | BNS धारा 85 — पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता |
| पुराना IPC समकक्ष | धारा 498A IPC |
| लागू होने की तारीख | 1 जुलाई 2024 |
| अपराध का प्रकार | संज्ञेय (Cognizable) |
| BNS 85 जमानती है या नहीं | गैर-जमानती (Non-Bailable) |
| समझौता योग्य स्थिति | गैर-समझौता योग्य (Non-Compoundable) |
| अधिकतम सज़ा | 3 वर्ष कारावास + जुर्माना |
| सुनवाई अदालत | प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट |
| संबंधित धारा | धारा 86 BNS (क्रूरता की परिभाषा देती है) |
नोट: यह तालिका केवल संदर्भ के लिए है। किसी भी कानूनी मामले के लिए योग्य वकील से सलाह लेना ज़रूरी है।
BNS 85 क्या है? सरल भाषा में समझें
चलिए सीधी बात करते हैं। BNS 85 क्या है, इसका एक-लाइन जवाब है: यह वह धारा है जो किसी शादीशुदा महिला के साथ उसके पति या ससुराल वालों द्वारा की गई क्रूरता को अपराध मानती है।
जब भारत में नया आपराधिक कानून, यानी भारतीय न्याय संहिता, 2023, लागू हुआ, तो पुरानी IPC की बहुत सी धाराओं के नंबर बदल गए। BNS 85 सेक्शन मूल रूप से वही पुराना IPC सेक्शन 498A है, बस नए नाम और नए नंबर के साथ। सामग्री वही है, सिर्फ पैकेजिंग बदली है — बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई पुराना प्रोडक्ट नए लेबल के साथ बाज़ार में वापस आता है।
इसका मतलब अगर कोई पति या उसके रिश्तेदार किसी महिला को शारीरिक, मानसिक, या दहेज के नाम पर परेशान करते हैं, तो उन पर BNS सेक्शन 85 के तहत केस बन सकता है।
विशेषज्ञ की राय: कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रावधान का मुख्य उद्देश्य हमेशा से महिलाओं को उनके ही घर में होने वाली क्रूरता से बचाना रहा है — चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो, या दहेज से संबंधित मांगें।
BNS 85 सेक्शन इन हिंदी — पूरा शब्दांकन
अब बात करते हैं BNS 85 सेक्शन इन हिंदी की, यानी इसका वास्तविक कानूनी शब्दांकन क्या कहता है:
“जो कोई, किसी महिला के पति या पति के रिश्तेदार होते हुए, उस महिला को क्रूरता का शिकार बनाता है, उसे तीन साल तक की अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा और वह जुर्माने का भी ज़िम्मेदार होगा।”
सरल शब्दों में — अगर पति या उसके परिवार के सदस्य किसी पत्नी के साथ क्रूरता करते हैं, तो उन्हें जेल हो सकती है, और साथ में जुर्माना भी लग सकता है।
अब सवाल यह आता है कि “क्रूरता” का मतलब क्या है? इसका जवाब BNS धारा 86 में दिया गया है, जो दो तरह की क्रूरता परिभाषित करती है:
- ऐसा जान-बूझकर किया गया व्यवहार जो महिला को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दे, या उसकी जान, अंग, या स्वास्थ्य (मानसिक या शारीरिक) को गंभीर खतरा पहुंचाए।
- ऐसी उत्पीड़न जो महिला या उसके रिश्तेदारों को कोई अवैध मांग (जैसे दहेज) पूरी करने के लिए मजबूर करे, या जो अवैध मांग पूरी न होने की वजह से की जाए।
BNS सेक्शन 85 भारतीय न्याय संहिता — पृष्ठभूमि समझें
चलिए थोड़ा पीछे चलते हैं। BNS सेक्शन 85 भारतीय न्याय संहिता का कॉन्सेप्ट नया नहीं है — इसकी जड़ें 1983 में जाती हैं, जब दहेज हत्याओं और वैवाहिक क्रूरता के बढ़ते मामलों को देखते हुए IPC में सेक्शन 498A जोड़ा गया था।
फिर 2023 में, जब संसद ने पुराने आपराधिक कानूनों — IPC, CrPC, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम — को बदलकर भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम बनाया, तो 498A का मूल विचार वही रहा, बस नया नंबर मिल गया: BNS 85। यह नया कोड 1 जुलाई 2024 से पूरे भारत में लागू हो गया।
BNS सेक्शन 85 इंडिया के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान इसलिए है क्योंकि वैवाहिक विवाद और घरेलू क्रूरता के मामले भारत में काफी आम हैं, और यह धारा सीधे उन पीड़ितों को कानूनी सुरक्षा देती है।
BNS 85 इन IPC — पुराना बनाम नया तुलना तालिका
बहुत लोगों का कन्फ्यूजन यही रहता है कि BNS 85 इन IPC का क्या मतलब है — क्या यह बिल्कुल वही है या कुछ बदलाव हुआ है? चलिए एक तालिका से समझते हैं:
| तुलना का बिंदु | IPC धारा 498A | BNS धारा 85 |
|---|---|---|
| लागू होने की तारीख | 1983 | 1 जुलाई 2024 |
| मूल अपराध | पति/रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता | पति/रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता (वही) |
| सज़ा | 3 वर्ष तक + जुर्माना | 3 वर्ष तक + जुर्माना (वही) |
| जमानती स्थिति | गैर-जमानती | गैर-जमानती (वही) |
| संज्ञेय स्थिति | संज्ञेय | संज्ञेय (वही) |
| समझौता योग्य स्थिति | गैर-समझौता योग्य | गैर-समझौता योग्य (वही) |
| क्रूरता की परिभाषा | उसी धारा में | धारा 86 BNS में अलग की गई |
जैसा आप देख सकते हैं, BNS 85 और IPC 498A में व्यावहारिक रूप से कोई बड़ा अंतर नहीं है। बस क्रूरता की परिभाषा को एक अलग धारा — धारा 86 — में डाल दिया गया है, ताकि कानून थोड़ा ज़्यादा व्यवस्थित लगे।
BNS 85 जमानती है या नहीं — विस्तार से समझें
यह सवाल शायद सबसे ज़्यादा पूछा जाता है: BNS 85 is bailable or not?
सीधा जवाब है — गैर-जमानती। इसका मतलब है कि अगर किसी पर यह केस दर्ज होता है, तो उसे जमानत लेने का स्वतः अधिकार नहीं होता। जमानत देना या न देना पूरी तरह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी ज़रूरी है — गैर-जमानती होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुलिस तुरंत गिरफ्तार कर लेगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले, अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014), में स्पष्ट रूप से कहा था कि पुलिस को स्वतः गिरफ्तार नहीं करना चाहिए जब तक धारा 35 BNSS (पहले धारा 41 CrPC) के तहत एक चेकलिस्ट संतुष्ट न हो जाए। मतलब, पुलिस को पहले यह देखना होगा कि गिरफ्तारी वास्तव में ज़रूरी है या नहीं।
विशेषज्ञ की राय: वकीलों का कहना है कि यह फैसला उन लोगों के लिए काफी राहत देता है जिन पर गलत तरीके से आरोप लगाए जाते हैं, क्योंकि इससे यांत्रिक गिरफ्तारियों को रोकने में मदद मिलती है।
BNS सेक्शन 85 दंड — कितनी सज़ा हो सकती है?
BNS सेक्शन 85 दंड की संरचना काफी सरल है:
- कारावास जो 3 साल तक बढ़ सकता है
- साथ में जुर्माना भी लगाया जा सकता है
यह दोनों चीज़ें — जेल और जुर्माना — साथ में भी हो सकती हैं, यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है। मामले की गंभीरता, सबूत, और परिस्थितियों को देखकर ही अंतिम सज़ा तय होती है।
एक और महत्वपूर्ण बिंदु — यह अपराध गैर-समझौता योग्य है। मतलब अगर शिकायतकर्ता (जो केस दर्ज करती है) बाद में अपना मन बदल ले और केस वापस लेना चाहे, तो वह ऐसे ही नहीं हो सकता। अदालत की अनुमति ज़रूरी होती है।
BNS 85 B — क्या यह अलग प्रावधान है?
कई लोग BNS 85 B भी सर्च करते हैं, यह सोचकर कि शायद यह कोई अलग उप-धारा है। लेकिन स्पष्टता के लिए बताते हैं — मौजूदा उपलब्ध कानूनी संसाधनों में धारा 85 के अंतर्गत कोई अलग “85(b)” उप-खंड आधिकारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है जो अलग से व्यापक रूप से प्रलेखित हो। ज़्यादातर कन्फ्यूजन क्रूरता की दो श्रेणियों — शारीरिक/मानसिक नुकसान और दहेज से संबंधित उत्पीड़न — को लेकर होता है, जो धारा 86 में परिभाषित की गई हैं, न कि धारा 85 के अंदर किसी उप-भाग में।
अगर आपको अपने विशिष्ट मामले में “85(b)” जैसा कोई संदर्भ मिला है, तो सबसे अच्छा होगा कि आप अपने केस के दस्तावेज़ किसी योग्य वकील को दिखाएं, ताकि सटीक कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सके।
BNS 85 धारा क्या है — FIR कैसे दर्ज होती है?
अब थोड़ी व्यावहारिक बात करते हैं। अगर कोई महिला सोच रही है कि BNS 85 धारा क्या है और इस धारा के तहत केस कैसे दर्ज करना है, तो प्रक्रिया कुछ इस तरह होती है:
- नज़दीकी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की जा सकती है, क्योंकि यह एक संज्ञेय अपराध है, पुलिस को FIR तुरंत दर्ज करनी होती है।
- अगर पुलिस FIR दर्ज करने से मना कर दे, तो धारा 223 BNSS के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज की जा सकती है।
- सबूत इकट्ठा करना महत्वपूर्ण होता है — जैसे मेडिकल रिपोर्ट्स, तस्वीरें, व्हाट्सएप संदेश, ईमेल, बैंक स्टेटमेंट्स (अगर दहेज मांग का मामला है), और गवाहों के बयान।
दूसरी तरफ, अगर कोई आरोपी है और उसे डर है कि गलत केस दर्ज हुआ है, तो वह अग्रिम जमानत के लिए सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट में आवेदन कर सकता है, ताकि गिरफ्तारी से पहले ही सुरक्षा मिल जाए।
दुरुपयोग का मुद्दा — दोनों पक्षों की बात
यह कहना गलत नहीं होगा कि BNS 85, जैसा पुराना 498A था, काफी विवादास्पद भी रहा है। एक तरफ यह धारा वास्तव में बहुत सी महिलाओं को क्रूरता और दहेज उत्पीड़न से बचाती है। दूसरी तरफ, अदालतों ने कई बार नोट किया है कि कुछ मामलों में इस प्रावधान का दुरुपयोग भी होता है — पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए या व्यक्तिगत बदले के लिए।
इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2017) और सोशल एक्शन फोरम बनाम भारत संघ (2018) जैसे मामलों में सुरक्षा उपाय सुझाए थे, जैसे फैमिली वेलफेयर कमेटियां बनाना, ताकि वास्तविक मामलों और झूठे मामलों में फर्क किया जा सके।
विशेषज्ञ की राय: एक वरिष्ठ वकील का कहना है कि “कानून खुद में न अच्छा है न बुरा — यह कैसे इस्तेमाल होता है, वही असली परीक्षा होती है।” यही बात BNS 85 पर भी लागू होती है।
BNS सेक्शन 85 पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता का दायरा सिर्फ पति तक ही सीमित नहीं है। इसमें शामिल हो सकते हैं:
- पति खुद
- ससुर (father-in-law)
- सास (mother-in-law)
- ननद, देवर, या दूसरे ससुराल के रिश्तेदार, अगर उनकी संलिप्तता क्रूरता में साबित हो
अदालतों ने पहले भी अपने फैसलों में कहा है कि क्रूरता सिर्फ शारीरिक मार-पीट तक सीमित नहीं, मानसिक यातना, अपमान, और असामान्य व्यवहार भी इसी के दायरे में आ सकते हैं। लेकिन सामान्य घर-घर के झगड़े या वैवाहिक कलह को “क्रूरता” नहीं माना जाता — वहां साबित करना होता है कि आचरण वास्तव में गंभीर था।
सोचिए एक उदाहरण — रिया (नाम बदला हुआ है) शादी के बाद अपने ससुराल में रहती है। उसका पति और सास उसे बार-बार दहेज कम लाने के लिए ताने मारते हैं, और कभी-कभी शारीरिक रूप से भी परेशान करते हैं। ऐसे मामले में रिया BNS 85 के तहत FIR दर्ज कर सकती है, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से एक संज्ञेय, गैर-जमानती अपराध है जिसमें पुलिस को कार्रवाई करना ज़रूरी होता है।
लेकिन अगर कोई दूसरा मामला है जहां बस सामान्य घर की बहस हुई हो, कोई वास्तविक धमकी या दहेज मांग न हो, तो वहां BNS 85 लागू नहीं होगा — क्योंकि अदालतों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सामान्य घरेलू असहमति क्रूरता की श्रेणी में नहीं आती।
निष्कर्ष
तो दोस्तों, अगर आप BNS 85 in Hindi समझना चाहते थे, तो अब स्पष्ट हो गया होगा — यह पुराने IPC सेक्शन 498A का ही नया वर्ज़न है, जो शादीशुदा महिला को उसके पति या ससुराल वालों द्वारा की गई क्रूरता से सुरक्षा देता है। BNS 85 गैर-जमानती, संज्ञेय, और गैर-समझौता योग्य अपराध है, जिसमें सज़ा 3 साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है।
चाहे आप एक पीड़िता हैं जो अपने अधिकार समझना चाहती हैं, या कोई जो गलत केस से डर रहा है, सबसे महत्वपूर्ण चीज़ यही है कि आप सही जानकारी के साथ एक योग्य वकील से बात करें। कानून हमेशा परिस्थिति-विशिष्ट होता है, और सामान्य लेख कभी भी व्यक्तिगत कानूनी सलाह का विकल्प नहीं हो सकता।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. BNS 85 क्या है?
2. BNS 85 जमानती है या नहीं?
नहीं, BNS 85 गैर-जमानती अपराध है। जमानत अदालत के विवेक पर निर्भर करती है।
3. BNS सेक्शन 85 की सज़ा क्या है?
सज़ा में 3 साल तक की जेल और जुर्माना दोनों हो सकते हैं।
4. क्या BNS 85 और IPC 498A एक समान हैं?
हां, दोनों की मूल सामग्री व्यावहारिक रूप से समान है। बस धारा संख्या बदली है और क्रूरता की परिभाषा अब धारा 86 में दी गई है।
5. क्या BNS 85 मामले में तुरंत गिरफ्तारी हो सकती है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट के अरनेश कुमार फैसले के अनुसार, पुलिस को गिरफ्तारी से पहले एक चेकलिस्ट का पालन करना होता है।
6. क्या BNS 85 का दुरुपयोग हो सकता है?
अदालतों ने पहले भी कहा है कि कुछ मामलों में इसका दुरुपयोग होता है, इसी लिए फैमिली वेलफेयर कमेटियां जैसी सुरक्षा उपाय सुझाई गई हैं।
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